बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास [History of Badrinath Temple in Hindi]

जैसा कि आप जानते ही हैं कि उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस पवित्र भूमि पर कई देवी देवता निवास करते हैं और आज के आर्टिकल में हम आपको बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास बताने जा रहे हैं जहाँ पर भगवान् विष्णु जी निवास करते हैं | यदि आप भी बद्रीनाथ मंदिर के इतिहास को जानना चाहते हैं तो इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें |

बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास

आदि शंकराचार्य द्वारा 9 वीं सताब्दी में स्थापित किया गया बद्रीनाथ मन्दिर या बद्रीनारायण मन्दिर भगवान् विष्णु जी को समर्पित है | बताया जाता है कि आदि शंकराचार्य 6 वर्षों तक इसी स्थान पर रहे थे, तथा इन 6 वर्षों के दौरान वे 6 माह बद्रीनाथ तथा 6 माह केदारनाथ में निवास करते थे |

बद्रीनाथ जी की प्रतिमा को आदि शंकराचार्य जी के द्वारा नारद कुंड से खंडित अवस्था में निकाला गया था | वर्तमान में बद्रीनाथ मंदिर में भगवान् विष्णु जी की काले रंग की मूर्ती खंडित अवस्था में ही है | यह मूर्ती कई वर्षों तक नारद कुंड में रहने के कारण खंडित हो गयी थी |

पुराणों के अनुसार बद्रीनाथ मन्दिर की स्थापना सतयुग से मानी जाती है | बद्रीनाथ धाम का उल्लेख भगवत पुराणस्कन्द पुराण तथा महाभारत में भी है | बेर (बदरी) के घने वन होने के कारण इस क्षेत्र का नाम बद्रीनाथ पड़ा |

About Badrinath Dham

भगवान् विष्णु जी को समर्पित बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे, प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित है | यह उत्तराखंड के चार धामों में से एक धाम, तथा उत्तराखंड के पंच बद्रीयों में से एक बद्री बद्रीनाथ मंदिर है, जिसे विशाल बद्री के नाम से भी जाना जाता है | उत्तराखंड में स्थित पंचबद्रीपंचकेदार तथा पंचप्रयाग पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं |

badrinath temple

बद्रीनाथ मन्दिर तीन भागों में बंटा हुआ है –

  1. सिंह द्वार
  2. मंडल
  3. गर्भगृह

Badrinath Temple (Height)

अत्यधिक ऊँचे नीलकंठ पर्वत शिखर के भव्य पृष्ट पट सहित, नर एवं नारायण नामक दो पर्वत श्रंखलाओं के पार्श्व में स्थित badrinath/बद्रीनारायण मन्दिर की ऊँचाई समुद्रतल से 3133 मीटर है | भगवान् विष्णु का यह भव्य मन्दिर अलकनंदा नदी के तट पर प्राकृतिक सौन्दर्य के बीचोबीच स्थित है |

बद्रीनाथ मंदिर का नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा ?

Badrinath Mandir का नाम बद्रीनाथ पड़ने के पीछे बहुत ही रोचक कथा है | बताया जाता है कि एक बार देवी लक्ष्मी बिष्णु भगवान् जी से रुष्ट होकर अपने मायके चली गयी थीं, तब भगवान् विष्णु जी ने उनको मनाने के लिए तपस्या प्रारंभ कर दी थी ताकि देवी लक्ष्मी उनके पास बापस लौट आयें |

जब देवी लक्ष्मी जी की नाराजगी दूर हई तो वह भगवान विष्णु जी को ढूंडते हुए उस स्थान पर पहुँच गयीं  जहाँ भगवान् विष्णु तपस्या कर रहे थे | उन्होंने देखा की विष्णु जी बदरी(बेर) के वन में बदरी के पेंड पर बैठकर तपस्या कर रहे थे | इसीलिए देवी लक्ष्मी ने विष्णु भगवान् को बद्रीनाथ का नाम दिया था |

यही कारण है कि विष्णु जी को समर्पित इस मन्दिर को Badrinath के नाम से जाना जाता है |

यह भी जानिये :- Purnagiri Temple की मान्यताएं क्या हैं और यहाँ कैसे पहुंचें ?

Story of Badrinath Temple in Hindi

कहानी -1

माँ गंगा जब पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, तब गंगा का वेग बहुत प्रबल था | अत्यधिक प्रबल वेग के कारण पृथ्वी पर होता विनाश देखकर माँ गंगा 12 अलग-अलग धाराओं में विभाजित हो गयी, जिसमे से एक पवित्र धारा अलकनंदा भी है |

विष्णु भगवान् जी का निवास स्थान इसी अलकनंदा नदी के तट पर होने के कारण यह स्थान बद्रीनाथ कहलाया और यहाँ पर स्थित भगवान् विष्णु जी का यह मन्दिर Badrinath Mandir के नाम से जाना जाने लगा | माना जाता है की भगवान् विष्णु जी की मूर्ति इस स्थान पर देवताओं के द्वारा स्थापित की गयी थी |

कहानी -2

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बद्रीनाथ मन्दिर की एक कहानी यह भी है कि जब भगवान् विष्णु इस स्थान पर तपस्या में लीन थे तब बहुत अधिक मात्रा में यहाँ पर हिमपात होने लगा था | यह दृश्य देख देवी लक्ष्मी ने भगवान् विष्णु के समीप बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप धारण कर लिया और सम्पूर्ण हिमपात को अपने ऊपर सहने लगीं |

वर्षों बाद जब भगवान् विष्णु तपस्या करके उस स्थान से उठे, तब उन्होंने देवी लक्ष्मी से कहा कि तुमने भी मेरे बराबर ही तप किया है इसलिए आज से बद्रीनाथ धाम में मुझे तुम्हारे साथ ही पूजा जाएगा  और तभी से बद्रीनाथ धाम में भगवान् विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा एक साथ की जाती है |

मान्यता है कि बद्रीनाथ मन्दिर में मांगी हुई मुराद भगवान् विष्णु अवश्य पूरी करते हैं |

Badrinath Temple Yatra (बद्रीनाथ यात्रा)

बद्रीनाथ यात्रा उत्तराखंड की प्रसिद्ध चार धाम यात्रा के अंतर्गत आती है | इस यात्रा के दौरान बद्रीनाथ दर्शन अर्थात भगवान् विष्णु जी के दर्शन किये जाते हैं | बद्रिनाथ मन्दिर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था | यह मन्दिर उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर नर-नारायण नामक पर्वत श्रंखलाओं के बीच में स्थित है |

पुराणों में इस तीर्थ को योगसिद्धामुक्तिप्रदाबद्रीवन,नर-नारायण आश्रम तथा बद्रिकाश्रम इत्यादि नामों से संबोधित किया है |

बद्रीनाथ यात्रा के दौरान बद्रीनाथ के दर्शनीय स्थल पंच धारापंच शिलापंच कुंड तथा माता मूर्ती का मन्दिर हैं | माता मूर्ती मन्दिर माणा गाँव (भारत का अंतिम गाँव) से 3 किलोमीटर दूर स्थित है |

Badrinath Temple कैसे पहुंचें ?

बद्रीनाथ मन्दिर पहुँचने के लिए  ऋषिकेश – श्रीनगर – रुद्रप्रयाग – कर्णप्रयाग – नंदप्रयाग – जोशीमठ – बद्रीनाथ मार्ग होकर जाना होता है | ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम की दूरी लगभग 297 किलोमीटर है |

[su_divider top=”no”]

उम्मीद करते हैं कि उपरोक्त आर्टिकल जो कि बद्रीनाथ मंदिर के इतिहास से सम्बंधित है आपको जरूर पसंद आया होगा क्योंकि इस आर्टिकल में हमने अपने पाठकों को बद्रीनाथ से सम्बंधित प्रत्येक तरह की जानकारी देने का प्रयास किया है | यदि आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिये ताकि ज्यादा लोग बद्रीनाथ मंदिर के इतिहास को जान सकें |

[su_divider]

Previous articlePurnagiri Temple की मान्यताएं क्या हैं और यहाँ कैसे पहुंचें ?
Next articleKasar Devi (कसार देवी) -उत्तराखंड का रहस्यमयी मंदिर

3 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here